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What is ​Fiscal Deficit- आसान शब्दों में जानिए फिस्कल डेफिसिट के बारे में सबकुछ

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What is ​Fiscal Deficit- आसान शब्दों में जानिए फिस्कल डेफिसिट के बारे में सबकुछ

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What is the meaning of fiscal deficit in Hindi : मान लीजीए कि जीडीपी 100 लाख करोड़ रु का है. और जैसा कि ऊपर के एग्जांपल में हमने देखा कि 2 लाख करोड़ ज्यादा खर्च हो रहा है. तो हम 100 लाख करोड़ रु के जीडीपी से 2 लाख करोड़ रु के अतिरिक्त खर्च को देखेंगे. ये दो परसेंट होता है. तो हम कहेंगे कि फिस्कल डेफिसिट 2 परसेंट हुआ.

फिस्कल डेफिसिट-
वैसे तो सुुनने में ही इतना भारी भरकम लगता है कि लोग इसे समझने से भी डरते हैं.
लेकिन ऐसा है नहीं.आपने एक पुरानी कहावत सुनी होगी.आमदनी अट्ठन्नी, खर्चा रुपैया.दरअसल फिक्सल डेफिसिट इसी का अंग्रेजी नाम है.आमदनी से जितना ज्यादा खर्चा होता है उसे फिस्कल डेफिसिट कहते हैं.
मान लीजिए कि सरकार की आमदनी 10 लाख करोड़ रु है. खर्चा 12 लाख करोड़ रु है. रकम के हिबास से 2 लाख करोड़ रु ज्यादा खर्च हुआ जो कि फिसकल डेफिसिट कहलाएगा. लेकिन आप अक्सर परसेंट में फिस्कल डेफिसिट सुनते होंगे. छे परसेंट. साढ़े छे परसेंट. 7 परसेंट. यहां एक पेंच है.
दरअसल आमदनी के मुकाबले जितना ज्यादा खर्च होता है उस रकम को जीडीपी से तुलना की जाती है. और ये देखा जाता है कि फिस्कल डेफिसिट की रकम जीडीपी का कितना परसेंट है.
मान लीजिए कि जीडीपी 100 लाख करोड़ रु का है. और जैसा कि ऊपर के एग्जांपल में हमने देखा कि 2 लाख करोड़ ज्यादा खर्च हो रहा है.
तो हम 100 लाख करोड़ रु के जीडीपी से 2 लाख करोड़ रु के अतिरिक्त खर्च को देखेंगे. ये दो परसेंट होता है. तो हम कहेंगे कि फिस्कल डेफिसिट 2 परसेंट हुआ.
लेकिन हमारे मन में एक सवाल उठा. आपके मन में भी उठा होगा. कि जब हम आप फिस्कल डेफिसिट में जाते हैं को कई लोग ताना देते हैं. अनाप शनाप खर्चा करोगे तो यही होगा. खर्चा पर कोई कंट्रोल ही नहीं होता है. ना समझ है.. पता नहीं कब समझेगा.
लेकिन सरकार का क्या. वहां भी तो यही हाल है. सरकार में तो बड़े बड़े आईएएस अधिकारी बैठते हैं. दिग्गज इकोनॉमिक एडवाइजर होते हैं.
छोटे से छोटे खर्च करने से पहले पर लंबी बैठकें करते हैं. फिर भी खर्चा आमदनी से ज्यादा हो जाता है. थोड़ा बहुत नहीं बल्कि साढ़े सोलह लाख करोड़ रु सालाना ज्यादा खर्च होजाता है. जो पिछला बजट बता रहा है.
अब आप पूछेंगे ऐसा कैसे होता है.
आपका सवाल जायज है. आखिर हर महीने मोटी रकम इनकम टैक्स के तौर पर हमारी आपकी सैलेरी से कट जाती है. सामान खऱीदने जाते हैं तो ऊपर से जीएसटी ले लिया जाता है. इन सबके बावजूद सरकार का खर्चा पूरा नहीं होता.
जी हां. नहीं पूरा होता है. दरअसल सरकार जब फिस्कल डेफिसिट का आकलन करती है तो उसमें तीन-चार तरह की आमदनी जोड़ती है. टैक्स रेवेन्यू, नॉन टैक्स रेवेन्यू, कर्ज की वसूली और दूसरे स्रोत से होने वाली आमदनी.
टैक्स रेवन्यू उस आमदनी को कहते हैं जो इनकम टैक्स की वसूली से आती है. जीएसटी से आती है. या एक्सपोर्ट इंपोर्ट ड्यूटी या फिर ऐसे ही किसी तरह टैक्स से जो आमदनी होती है. वो सब टैक्स रेवेन्यू में आती है.
ऐसा नहीं है कि सरकार की सारी आमदनी टैक्स वसूलने से ही होती है. जो कर्ज सरकार देती है उस पर ब्याज मिलता है. कंपनियां डिविडेंड देती हैं. विदेशों से भी अच्छा खासा ग्रांट मिलता है. ये सब नॉन टैक्स रेवेन्यू में आता है.
पिछले साल के बजट के हिसाब से ये सब मिलकर करीब 22 लाख 80 हजार करोड़ रु हो जाएंगे. मोटा मोटी 23 लाख करोड़ ही मान लीजिए.
लेकिन इसके सामने खर्च होजाता है. करीब साढ़े 39 लाख करोड़ रु . यानी आमदनी के मुकाबेल 16 लाख 61 हजार करोड़ रु ज्यादा खर्च होता है. ये आंकड़े खुद सरकार ने चालू कारोबारी साल के लिए बजट पेश करते हुए दिए थे.
अब आप पूछेंगे कि सरकार के फिस्कल डेफिसिट से हमारा क्या लेना देना.लेना देना है.जैसे हमारा आपका फिस्कल डेफिसिट बढ़ता है तो क्या करते हैं.
पहले जहां समर वैकेशन में यूरोप औऱ न्यू ईयर में दुबई जाते थे. अब शिमला मनाली से कम चला लेते हैं. हर हफ्ते आउटिंग पर जाते थे. तो अब महीने में एक बार जाते हैं. तब भी बात नहीं बनी तो कर्ज लेना पड़ जाता है.
यही हाल सरकार का अगर फिस्कल डेफिसिट बढ़ता है तो सरकार खर्च पर कंट्रोल करती है. राहत देने से बचती है. पेट्रोल डीजल पर टैक्स नहीं घटाती है. तब भी बात नहीं बनती तो उधारी यानी बॉरोईंग करती है. जब बॉरोईंग ज्यादा करती है तो हमारी आपकी सेविंग पर ब्याज कम होने का खतरा मंडराने लगता है.
इसलिए इस बार फिस्कल डेफिसिट सरकार क्या पेश करती है वो जानना काफी अहम होगा. चालू कारोबारी साल के लिए पिछले बजट में 6.4 परसेंट फिस्कल डेफिसिट का अनुमान पेश किया गया था. इस बार उम्मीद की जा रही है कि अगले कारोबारी साल के लिए 6 परसेंट से कम रखा जा सकता है फिस्कल डेफिसिट.
फिस्कल डेफिसिट के साथ साथ एक औऱ शब्द आप सुनते होंगे. रेवेन्यू डेफिसिट. ये भी फिस्कल डेफिसिट से ही मिलता जुलता मामला है.
सरकार के अलग अलग विभागों को चलाने में, सर्विस देने में, कर्ज पर ब्याज चुकाने में, सब्सिडी देने में. यहां तक की राज्य सरकार को ग्रांट देने में जो खर्च होता है उसे रेवेन्यू एक्सपेंडिचर कहते हैं. जब ये रेवेन्यू एक्सपेंडिचर सरकार के टैक्स और नॉन टैक्स रेवेन्यू से होने वाली आमदनी से ज्यादा हो जाती है तो उसे रेवेन्यू डेफिसिट कहते हैं. यानी रेवेन्यू रिसिप्ट के मुकाबले जो रेवेन्यू एक्सपेंडिचर ज्यादा होता है. चालू कारोबारी साल के लिए 3.8 परसेंट रेवेन्यू डेफिसिट का अनुमान है.
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